जीवन कौशल प्रबंधन एवं अभिवृत्ति – 3

प्र.1 शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में ऐसे कार्यकलाप किस प्रकार उपयोगी हैं?
उ. साहित्यिक कार्यकलाप भाषा निर्माण, शब्दावली ज्ञान, वाक्पटुता, अभिव्यक्ति, संप्रेषण सृजनात्मक लेखन, स्वतंत्र दृष्टिकोण आदि को बेहतर बनाने में सहायक होते हैं। विद्यार्थियों की छिपी प्रतिभा को उभारने और आत्म विश्वास विकसित करने में ऐसे कार्यकलाप विद्यार्थियों को विभिन्न अवसर प्रदान करते हैं। इस प्रकार साहित्यिक कार्यकलाप शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक होते हैं।

प्र.2 सांस्कृतिक कार्यकलाप क्या होते हैं इनके अंतर्गत कौन-से कार्यकलाप आते aहैं?

उ. संस्कृति और पंरपरा पर आधारित कार्यकलाप सांस्कृतिक कार्यकलाप कहलाते हैं जैसे-धार्मिक, सामाजिक और राष्ट्रीय त्यौहार मनाना, लोक नृत्य, संगीत, नाटक, नृत्य, चित्रकला, पिकनिक, भ्रमण करना, फैंसी ड्रेस मस्ती आदि का आयोजन।

प्र.3 साहित्यिक कार्यकलाप के क्या उद्देश्य हैं?

उ. साहित्यिक कार्यकलापों के निम्नलिखित उद्देश्य हैं__
1. अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रभावी तरीके से करना।
2. विभिन्न साहित्यिक ग्रंथों की जानकारी प्राप्त कर करना।
3. स्वतंत्र सोच विकसित करना।
4. प्रकरण से संबद्ध उपयोगी संदर्भो को मालूम करना।
5. पत्रिका के लिए लेखों को समझना और संपादन भी कर लेना।
6. पूरक पाठ्य सामग्री में रूचि विकसित करना।
7. विषय वस्तु से संबद्ध लेखों को एकत्र करना।
8. वाकपटुता, बोध शक्ति और विश्लेषण के कौशल को विकसित कर लेना।
9. सृजनात्मक योग्यता विकसित करना।
10. साहित्य में रूचि विकसित करना और
11. प्रभावी तरीके से संप्रेषण का विकास।

प्र.4 सांस्कृतिक कार्यकलाप के क्या उद्देश्य हैं?

उ. सांस्कृतिक कार्यकलाप के निम्नलिखित उद्देश्य हैं_
1. प्रभावकारी अभिव्यक्ति का विकास करना।
2. अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना।
3. सृजनात्मकता का विकास करना।
4. खाली समय का भरपूर सदुपयोग करना।
5. चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व का विकास करना।
6. छिपी प्रतिभा का प्रदर्शन करना।
7. सामाजिक जीवन-यापन करना।
8. राष्ट्रीय अखंडता का उन्नयन करना।
9. अध्यापकों के साथ सहयोग और समन्वय करना।
10. वियोजन और संगठन के कौशल का विकास करना।
11. अपनी संस्कृति और परंपराओं का ज्ञान और आदर करना।

प्र.5 स्कूली शिक्षा में शारीरिक प्रशिक्षण का क्या महत्व है?

उ. मानव विकास का मुख्य एवं महत्वपूर्ण पहलू है, शारीरिक विकास, स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का विकास होता है। स्कूली शिक्षा के महत्वपूर्ण पहलुओं में शारीरिक प्रशिक्षण भी अहम् स्थान प्राप्त कर चुका है।

प्र.6 शारीरिक शिक्षा में किस प्रकार के खेल-कूद शामिल हैं?

उ. शारीरिक विकास कार्यकलापों में कक्षा के भीतर और बाहर खेले जाने वाले खेलकूद शामिल होते हैं जैसे- सामूहिक अभ्यास, परेड, ए.सी.सी. आदि। कमरे में खेले जाने वाले खेलों में शतरंज, टेबल टेनिस, चिड़ी छक्का आदि शामिल हैं। जबकि खुले मैदान में खेली जाने वाली क्रीड़ाओं में कबड्डी, क्रिकेट,
फुटबाल, वॉलीबाल, हॉकी आदि शामिल है।

प्र.7 शारीरिक कार्यकलाप में भाग लेने वाले विद्यार्थियों को किस प्रकार के लाभ की प्राप्ति होगी?

उ. शारीरिक कार्यकलापों में भाग लेने के बाद, विद्यार्थी को निम्नलिखित प्रकार के लाभ की प्राप्ति होगी।
1. शारीरिक विकास की प्राप्ति कर सकेंगे।
2. मनोक्रियात्मक विकास की प्राप्ति कर सकेंगे।
3. अनुशासन विकसित कर सकेंगे।
4. अपने में टीम भावना पैदा कर सकेंगे।
5. नेतृत्व के गुण विकसित कर सकेंगें।
6. सामाजिक गुणों का विकास करेंगे।

प्र.8 विद्यालय में पाठ्य-सहगामी कार्यकलापों के आयोजन में अध्यापक की भूमिका क्या है?

उ. विद्यालय में पाठ्य-सहगामी कार्यकलापों के आयोजन में अध्यापक की भूमिका निम्नलिखित होती हैंनियोजक के रूप में- पथ प्रदर्शक के रूप में, प्रवर्तक के रूप में, निदेशक के रूप में, आयोजक के रूप में, रिकॉर्डकर्ता और मूल्यांकनर्ता के रूप में, प्रबंधक के रूप में, निर्णायक के रूप में, उपबोधक के रूप में, अभिप्रेरक के रूप में,संप्रेषक के रूप में तथा समन्वयक के रूप में।

प्र.9 समय-सारणी से क्या अभिप्राय है?

उ. समय-सारणी ऐसी कार्यसूची है, जो बताती है कि किस पीरियड (कालांश) के दौरान कौन-सा काम किया जा रहा, किसके द्वारा किया जा रहा है, कहां किया जा रहा है और कब किया जा रहा है।

प्र.10 समय-सारणी का क्या महत्व है?

उ. स्कूल को सुचारू ढंग से काम करने में, समय-सारणी एक आवश्यक साधन है। समय-सारणी का महत्व-
1. समय और ऊर्जा की बर्बादी को दूर करता है।
2. दोहरापन और परस्पर व्याप्ति को दूर करता है।
3. प्रत्येक विषय और कार्यकलाप पर ध्यान देना सुनिश्चित करता है।
4. स्कूल जीवन में व्यवस्था ले आता है।
5. सभी अध्यापकों में कार्य के समान वितरण को सुनिश्चित करता है।
6. विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुसार स्कूल कार्य के समायोजन में सहायता करता है।
7. अध्यापक की अनुपस्थिति में कार्य का आवंटन करता है।
8. नैतिक मूल्यों और अन्य अच्छी आदतों का विकास करता है।
9. स्कूल में अनुशासन कायम करने में सहायता प्रदान करता है।
10. स्कूल की दक्षता में योगदान देता है।

प्र.11 परीक्षा संचालन में अध्यापक द्वारा कौन-सी सावधानी रखनी चाहिए?

उ. अध्यापकों को प्रश्न-पत्र काफी पहले तैयार करने चाहिए और मुद्रण से संबद्ध अशुद्धियों से बचने के उद्देश्य से, उन्हें टंकित करवाकर प्रूफ रीडिंग भी कर लेनी चाहिए। अध्यापकों को निरीक्षण कार्यसूची का आदर और पालन करना चाहिए। आपातकालिक स्थिति में, अध्यापकों को चाहिए कि वे अंतिम क्षण पर होने वाली गड़बड़ी से बचने के लिए परीक्षा-प्रभारी को सूचित करें। प्रश्न-पत्र पर सभी हिदायतों की जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए जिससे बाद में कोई उलझन न हो।

प्र.12 विद्यालयी अभिलेखों से हमें किस प्रकार की जानकारी प्राप्त होती है?

उ. विद्यालय अभिलेखों में संस्था के उद्देश्य परिलक्षित होते हैं। इनसे उसकी उत्पत्ति, विकास और दर्शन का भी ज्ञान होता है। राज्य सरकारों ने प्रत्येक माध्यमिक विद्यालय द्वारा कुछ निश्चित अभिलेखों का रखना अनिवार्य कर दिया है।

प्र.13 विद्यालयी अभिलेख कितने प्रकार के होते हैं?

उ. विद्यालयी अभिलेख छह प्रकार के होते हैं- सामान्य अभिलेख, अध्यापकों से संबंधित अभिलेख, विद्यार्थियों से संबंधित अभिलेख, उपकरण संबंधी अभिलेख, सांख्यिकीय आंकड़ा अभिलेख एवं वित्तीय संबंधी अभिलेख।

प्र.14 विद्यालय के लिए अभिलेख क्यों आवश्यक है?

उ. विद्यालय एक सामाजिक संस्था है जो अभिभावकों, प्रबंधसमिति, शिक्षा-विभाग, समुदाय एवं विद्यार्थियों के प्रति उत्तरदायी है। अतः विद्यालय अभिलेख बहुत ही आवश्यक है।

प्र.15 विद्यालय-दैनन्दिनी क्या है?

उ. विद्यालय- दैनन्दिनी (डायरी) विद्यालय का दर्पण है। इस पर विद्यालय का प्रतीक चिह्न तथा आदर्शवाक्य (motto) छापा होता है इसमें पूरे वर्ष का कार्यक्रम भी दिया होता है।

प्र.16 प्रोफाइल क्या होता है?

उ. प्रोफाइल विद्यालय जीवन में विद्यार्थी के सभी पहलुओं की अभिवृद्धि तथा विकास का अभिलेख है। यह विद्यार्थी के बहु-आयामी विकास का दर्पण है।

प्र.17 अध्यापक-दैनन्दिनी का क्या महत्व है ?

उ. दैनन्दिनी-अध्यापक की अनुदेशात्मक क्रियाओं की रूपरेखा प्रदिर्शत करती है क्योंकि इसमें पाठ्य-सामग्री, उसकी उद्देश्य, शिक्षण विधियाँ, गृह-कार्य आदि का वितरण दिया जाता है। अतः यह बड़ा महत्वपूर्ण अभिलेख है।

प्र.18 विद्यालयों में पुस्तकालय का क्या महत्व है?

उ. शैक्षणिक प्रक्रिया में गुणात्मक सुधार लाने के लिए उत्तम पुस्तकालय सेवा आवश्यक है। प्रभावी पुस्तकालय सेवा से वंचित विद्यालयों की तुलना में अच्छे पुस्तकालय वाले विद्यालयों के शैक्षणिक कार्य भी अधिक अच्छे होते हैं। पुस्तकालय में स्वयं अध्ययन करना विद्यालयी शिक्षा का एक प्रमुख अंग है।

प्र.19 विद्यालय में प्रयोगशाला का होना कितना आवश्यक है?

उ. प्रयोगशाला का उद्देश्य विज्ञान-शिक्षण को प्रभावी बनाना एवं विद्यार्थियों की विज्ञान में रूचि विकसित करना है। प्रयोगशाला में विज्ञान के सैद्धांतिक ज्ञान को वास्तविक रूप में प्रयोग करके सीखने का अवसर मिलता है।

प्र.20 विद्यालय में प्रयोगशाला के महत्व के बारे में बताइए?

उ. विद्यार्थी जिन बातों को उद्देश्य क्रियाओं के द्वारा सीखते हैं वे उनके मस्तिष्क में स्थायी रूप से जम जाती है। प्रयोगात्मक कार्य के अभाव में छात्र का ज्ञान अपूर्ण और सतही रहता है।

प्र.21 विज्ञान की प्रयोगशाला में क्या-क्या होना चाहिए?

उ. भौतिकी प्रयोगशाला रसायन एवं जीवविज्ञान की प्रयोगशालाओं से भिन्न प्रकार की होती है। प्रायः रसायन प्रयोगशाला में रासायनिक पदार्थ और जीवविज्ञान प्रयोगशाला में लेंस, दर्पण, प्रिज्म, वोल्टमीटर गैल्वेमीटर, लोलक वर्नियर कैलीपर्स आदि होते हैं। यंत्रों को रखने के लिए आलमारियाँ। कुछ अन्य यंत्रों के रखने या लटकाने के लिए पक्के स्थायी स्टैंड।

प्र.21 प्रयोगशाला में विद्यार्थियों को किस प्रकार के निर्देश देने चाहिए?

उ. विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित निर्देश दिए जाने चाहिएछात्रों को उपकरण सावधानी से संभाल कर प्रयोग में लाने चाहिए। रसायनों का उपयोग हो जाने के उपरांत, उनके स्थानपत्र रसायनों को अपने उचित स्थान पर रख देना चाहिए। विभिन्न रसायनों को मिलाकर नहीं रखना चाहिए। सांद्र अम्ल जैसे खतरनाक रसायनों को पिपेट में मुंह द्वारा नहीं खींचना चाहिए। सूक्ष्मदर्शी को प्रयोग करने के बाद साफ करके रखना चाहिए। डिब्बे या शीशी आदि पर लगे अंकन से छेड़छाड़ न करें। आग लगने की स्थिति में अग्निशमन यंत्र का उपयोग करें।

प्र.22 प्रयोगशाला में अध्यापक की भूमिका क्या है?

उ. प्रयोगशाला के कुशल संचालन में अध्यापक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उसे प्रयोगशाला में उपलब्ध सामान, उपकरणों व यंत्रों की जानकारी होनी चाहिए। अध्यापक को पूरा ध्यान रखना चाहिए कि छात्र प्रयोगशाला के नियमों एवं निर्देशों का उचित पालन करते रहें। अध्यापक को कक्षा में समय-समय पर घूमते रहते हुए छात्रों के कार्यों का निरंतर प्रेक्षण करते रहना चाहिए ताकि कुशाग्र बुद्धि वाले बालक अन्य कमजोर छात्रों को दबाकर न रखें।

प्र.23 विद्यालय बजट का अर्थ और प्रयोजन के बारे में बताइए?

उ. विद्यालय बजट का अर्थ : बजट, आय-व्यय संबंधी एक योजना है जिसमें हमारे आय को, हमारे उद्देश्यों के अनुरूप उपभोग, बचत तथा निवेश वाले विभिन्न मदों के बीच वितरण को दर्शाया जाता है। अतः यह वांछित लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु धन के प्रयोग का समयबद्ध उचित व उपयोगी ढंग बताता है।

प्र.24 विद्यालय बजट बनाने के प्रमुख उद्देश्य क्या है?

उ. बजट बनाने के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं- यह विद्यालय के कार्यक्रमों की योजना बनाने में सहायक है, इसमें विद्यालयी कार्यक्रम निश्चित व्यय एवं समय सीमा में पूर्ण करने की रूपरेखा होती है, इससे विद्यालय के संसाधनों का समुचित उपयोग किया जा सकता है, यह विद्यालय के कार्यक्रमों के मूल्यांकन में भी मार्गदर्शक होता है, इससे विद्यालय के विभिन्न कार्यक्रमों के संचालन में सहायता मिलती है, बजट विद्यालय के उद्देश्य एवं कार्यक्रमों की प्राथमिकताओं का दर्पण है।

प्र.25 विद्यालय-बजट कितने प्रकार के होते हैं?

उ. समय की अवधि के आधार पर विद्यालय दो प्रकार के बजट होते हैंआगामी वित्तीय वर्ष के लिए तैयार किया गया बजट तथा दीर्घकालीन बजट आगामी आय-व्यय की योजना बना ली जाती है। इस प्रकार का बजट परम्परागत बजट कहलाता है।

प्र.26 पाठ्येत्तर कार्यकलाप विद्यार्थियों के लिए किस प्रकार सहायक हैं?

उ. पाठ्येत्तर कार्यकलाप वे क्रियाएँ हैं जो पाठ्यक्रम से संबंधित नहीं होती, परंतु मनोरंजन एवं आनंदायक क्रियाएं हैं और वे बालक के मानसिक, सामाजिक, भावात्मक तथा नैतिक विकास में सहायक होती हैं।

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